मूत्राशय की पथरियां और उनका आयुर्वेदिक उपचार.....

पथरी का रोग आजकल आम होता जा रहा है। इससे बच्चों से लेकर वृध्दों तक कोई भी पीड़ित हो सकता है। पथरी जिसे अंग्रेजी में स्टोन, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की भाषा में कैलकुलश और प्राचीन चिकित्सा विज्ञान की भाषा में अश्मरी कहा जाता है, लम्बे समय तक अपथ्य आहार के सेवन और समय-समय पर पंचकर्म आदि विधाओं से शरीर की आवश्यक आंतरिक सफाई की अवहेलना के कारण पैदा होती है। आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य के शरीर के त्रिदोषों वात, पित्त और कफ में से कफ जब कुपित हो जाता है, तो वह मूत्र के साथ मिलकर मूत्रालय में अश्मरी को जन्म देता है। वैसे अश्मरी या पथरी का रोग चार प्रकार का हो सकती है। कफज, पित्तज, पथरी और शुक्रजन्य अश्मरी रोग। श्लेष्मा या कफ अश्मरियों का अधिष्ठान है। अश्मरी या पथरी के रोगी के लक्षण ज्वर, मूत्राशय में पीड़ा, कठिनाई से मूत्र निष्कासन, मूत्र में बकरे जैसी गंध के रूप में सामने आते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि जब व्यक्ति को पेशाब आता है तो मूत्राशय में मौजूद पथरी मूत्रमार्ग को सकरा कर देती है और पेशाब उतनी सरलता और तेजी से बाहर नहीं निकल पाता जितना उसके बहाव का दबाव होता है। इसकी वजह से यूरीनरी ब्लैडर अर्थात् मूत्रालय और पेरीनियम अर्थात् गुदा और अंडकोष के मध्य के सीवन के क्षेत्र में दर्द के साथ मूत्र निष्कासन में पीड़ा होती है। वातादि दोषों के मिलने के कारण मूत्र का रंग रक्तिम और गंदलापन लिए हो सकता है। यही नहीं अश्मरी के रोगी को मूत्रोत्सर्जन के अलावा दौड़ने, कूदने, तैरने, घुड़सवारी करने, गर्मी में चलने और पथरीले रास्ते पर चलने भी मूत्रांगों के क्षेत्र में पीड़ा हो सकती है। इन सामान्य लक्षणों के अलावा अलग-अलग पथरियों के कुछ लक्षण भी अलग होते हैं।


1. श्लेष्मा या कफ अंश्मरी- इस अश्मरी का कारण लम्बे समय तक कफवर्धक अन्न का अधिक मात्रा में सेवन करते रहना है। ऐसा करने अधिक मात्रा में कफ जब वस्ति मुख की ओर बढ़ता है तो उससे इस क्षेत्र में कुल्हाड़े से काटने या आरी चलाने या सुई चुभाने जैसी पीड़ा होती है। यह पथरी रंग में सफेद, चिकनी और मुर्गी के अंडे के समान होती है।


2. पित्ताश्मरी- पथरी के इस रोग में पित्त कफ से मिलकर वस्ति मार्ग को रोक देता है। इसमें मूत्राशय के चारों ओर का मार्ग गर्म होता है। इस श्रेणी की पथरी काली भिलावे (वनौषधियों में काम आने वाला एक फल) की गुठली के समान तथा शहद के रंग जैसी होती है।


3. वाताश्मरी- इस रोग में कफ वात या वायु से मिलकर कठोर हो जाता है और वस्तिमुख का आश्रय लेकर मूत्रवह स्रोतों को रोक लेता है। मूत्र के रूकने से वस्ति क्षेत्र में तीव्र वेदना होती है। वेदना की तीव्रता इतनी होती है कि रोगी उसे सहन करने के लिए दांतों को दबाता है, चिल्लाता है। इस पथरी के कारण न केवल मूत्रत्याग बल्कि मल और अपान वायु के उत्सजेन में भी कठिनाई होती है। वाताश्मरी काले रंग की, कठोर, खुरदरी और कदंब के फूल के समान होत है।


4. शुक्राश्मरी- यह पथरी पुरुषों में होती है। यह यकायक मैथुन को रोकने अथवा अति मैथुन के कारण अपने सथान से निकल चुके शुक्राणुओं के नियमित शुक्रमार्ग से न निकलकर वायु द्वारा अलग-बगल की धमनियों में ऊपर-नीचे जमा होने के रूप में सामने आती है जिसमें इसके कण जननांग के मध्य में गोलाकार हो जाते हैं। इसको एकत्रित कर वायु सुखा देती हैं। इसका नतीजा मूत्र के कठिनाई से आने, वस्ति में वेदना और दोनों अंडकोषों में सूजन उत्पन्न होने के रूप में सामने आती है। नयी-नयी अश्मरी वायु द्वारा छोटे-छोटे परमाणुओं में विभक्त हो जाती है और इसे शर्करा कहते हैं। ये शर्करा सदृश अश्मरी के कण जब मूत्रमार्ग में पहुंचकर रुक जाते हैं उस समय रोगी को दुर्बलता, बेचैनी, पेट में दर्द, पांडु रोग, उष्णवात, तृष्णा, हृदय में वेदना और उल्टी का कारण बनते हैं।


अश्मरी चिकित्सा: अश्मरी का रोग समय रहते और समुचित चिकित्सा के अभाव में भयानक होने के साथ प्राणघातक हो सकता है। लेकिन यदि इसका प्रारम्भ में ही निदान हो जाए तो औषधियों से ठीक हो सकता है और यदि पथरी थोड़ा बढ़ भी जाए तो शल्य कर्म से काट निकाला भी जा सकता है। आयुर्वेद में अश्मरी के उपचार में त्रिदोषों के आधार पर जड़ी-बूटियों की व्यवस्था देता है जिससे रोग का जड़ से उपचार हो जाता है।


1. गोखरू के बीजों के चूर्ण को शहद के साथ भेड़ के दूध में घोलकर सात दिन तक पीने से अश्मरी घुलकर निकल जाती है।


2. शर्कराश्मरी में तिल, चिरचिट, केला, ढाक, जौ के तुष, इनका क्षार भेड़ के मूत्र के साथ पीना चाहिए। इससे शर्करा नष्ट हो जाती है।


3. गोखरू, मुलेठी, ब्राहमी का चूर्ण भेड के मूत्र के सात पीने से भी अश्मरी नष्ट होती है।


4. अश्मरी के रोगियों के लिए पुनर्नवा से सिध्द दूध पानी भी हितकर होता है।


5. पथरी के रोगियों को वीरतरवादि गण की जडी-बूटियों को घी या दूध के साथ या काढ़े अथवा खिचड़ी के रूप में लेना चाहिए। घी, क्षार, काढ़ा, दूध और उत्तर वस्ति से भी यदि अश्मरी शांत न हो तो शल्यकर्म का सहारा लेना चाहिए। शास्त्रीय औषधियों में गोक्षुरादि गुग्गलु, चंद्रप्रभावटी और हजरलयहूद भस्म, त्रिविक्रम रस, पाषाणभेदादि चूर्ण, तृणपंचमूल कषाय, वृहदवर्णादि कषाय और पूनःनवाद्यरिष्ट भी अश्मरियों के उपचार में सफल सिध्द होती है, लेकिन इन्हें किसी योग्य वैद्य के परामर्श और देखरेख में ही लेना चाहिए।