भिखारी ठाकुर के जीवन पर आधारित नाटक का हुआ मंचन, उठे ये सवाल ?

नयी दिल्ली,  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा आयोजित भारत रंग महोत्सव में शुक्रवार को लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के जीवन और संघर्ष पर आधारित नाटक “भिखारीनामा” का मंचन किया गया, जिसके जरिए जातीय भेदभाव की सामाजिक बुराई पर कई सवाल उठाये गए।


नाटक में बिहार की पारंपरिक लोक कलाओं में शामिल “लौंडा नाच” की झलक भी देखने को मिली। जैनेन्द्र दोस्त द्वारा निर्देशित संगीतमय नाटक का मंचन भिखारी ठाकुर रंगमंडल प्रशिक्षण एवं शोध केंद्र के कलाकारों ने किया। इस नाटक के माध्यम से भिखारी ठाकुर के बचपन से लेकर युवावस्था तक का और जातीय पूर्वाग्रहों तथा आजीविका के लिए प्रवास के चलते उनके द्वारा सामना किए गए संघर्षों का चित्रण किया गया है।


जैनेन्द्र “लौंडा नाच” के विषय पर पीएचडी करने और इस दौरान ठाकुर की विरासत को जानने के बाद उनकी कहानी को दुनिया को बताना चाहते थे। ‘‘लौंडा नाच’’ मंच कला का वह रूप है जिसमें पुरूष महिलाओं की वेश भूषा में नाचते-गाते हैं। हालांकि, आजकल इस कला को अश्लील माना जाता है। निर्देशक ने अपने मनोभाव प्रकट करते हुए कहा, “मैंने भिखारी के जन्म से लेकर नाच मंडली स्थापित करने तक उनके बारे में घटनाओं और कहानियों का संकलन करना शुरू किया।


मैंने उन घटनाओं को नाटक के रूप में लिखने से पहले क्रमानुसार रखा। यहाँ वास्तविक चुनौती यह थी कि किस प्रकार ठाकुर के जीवन और काम को प्रस्तुत किया जाए। हमें इसका जवाब हमारी लौंडा नाच परंपरा में मिला। हमने गीत, संगीत, नृत्य, नाट्य और हास्य सबको एक साथ पिरोकर एक नाटक का रूप दिया।”


दोस्त ने पीटीआई-भाषा से कहा कि ठाकुर ने विधवाओं से बुरा व्यवहार, दहेज प्रथा, बालिकाओं की तस्करी, जातिगत भेदभाव जैसे मुद्दों को बयां करने वाले गीत दर्शकों के सामने गंभीरता से गाए। (ठाकुर) अपने समय से सौ साल आगे थे। यह दुखद है कि सामाजिक बुराइयां आज भी हैं। लेकिन वह हमेशा प्रासंगिक रहेंगे।